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Chapter 2 - Meri Zindagi chapters

Recap:

पिछले अध्याय में मैंने अपने बचपन की बातें बताई थीं। मैं बहुत शरारती और बहुत ज़्यादा बोलने वाला लड़का था। दोस्तों के साथ खेलना, मस्ती करना और फिर मम्मी-पापा की डाँट खाना — यही मेरी रोज़ की आदत थी।

मेरे घर वाले मुझे "चेंट" कहते थे क्योंकि मैं बहुत बोलता था। मुझे लगता था कि ज़्यादा बोलना कोई बड़ी बात नहीं है।

लेकिन मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरी यही आदत एक दिन मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मुसीबत बन जाएगी…

और अब मैं आपको बताने वाला हूँ उस दिन के बारे में, जब एक छोटी सी बात ने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी। कहानी

यह बात उस समय की है जब मैं आठवीं कक्षा में था। अभी-अभी हमारी परीक्षाएँ खत्म हुई थीं और गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई थीं।

मैंने तय कर लिया था कि इस बार की छुट्टियाँ मैं पूरी तरह अपने दोस्तों के साथ मस्ती करते हुए बिताऊँगा।

एक दिन मैं अपने दोस्तों के साथ राम मंदिर में बैठा हुआ था। वह मंदिर अभी कुछ ही महीनों पहले बना था, इसलिए हर रात वहाँ पूजा होती थी।

उस रात पूजा खत्म होने के बाद हम सब वहीं बैठकर मज़ाक और बातें कर रहे थे।

जैसा कि आप जानते हैं, मैं बहुत ज़्यादा बोलता था। उसी दौरान मैंने मज़ाक-मज़ाक में एक बात कह दी —

"कल सुबह हम सब रनिंग पर चलेंगे।"

मेरे दोस्तों ने पूछा,

"कितने बजे?"

मैंने कहा,

"सुबह 3 से 4 बजे के बीच।"

मेरे साथ उस दिन आठ दोस्त थे —

सूरज, प्रियांशु, नेहा, लड्डू, श्रेया, सूर्यांश, आलोक और मैं।

सबने हँसते हुए कहा,

"ठीक है, कल चलते हैं।"

लेकिन मुझे क्या पता था कि मेरे इस एक फैसले से हमारी ज़िंदगी बदलने वाली है…अगली सुबह हम सब साढ़े तीन बजे रनिंग के लिए निकले। शुरू-शुरू में सब कुछ ठीक था।

दौड़ते-दौड़ते अचानक मेरे दिमाग में एक आइडिया आया। मैंने कहा,

"क्यों न हम आगे वाले सरकारी स्कूल की तरफ चलें? वह स्कूल काफी समय से बंद पड़ा है।"

दोस्तों ने कहा,

"चलो, देखते हैं।"

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, कोहरा बढ़ता जा रहा था और ठंड भी अजीब तरह से बढ़ रही थी।

मैंने सोचा —

"गर्मी के मौसम में इतनी ठंड कैसे हो सकती है?"

ऐसा लग रहा था मानो गर्मी नहीं, सर्दी का मौसम हो।

लेकिन मैंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और हम आगे बढ़ते गए।

थोड़ी दूर जाने के बाद हमने देखा कि चारों तरफ अजीब सा अंधेरा था और एक भी सड़क की लाइट नहीं जल रही थी।

अचानक हमने देखा कि सड़क के बीच में एक आदमी खड़ा है।

हमने सोचा शायद कोई और भी रनिंग कर रहा होगा।

मेरे दो दोस्त उसे देखने के लिए आगे बढ़े। तभी अचानक वह आदमी गायब हो गया।

मैंने सोचा शायद वह आगे चला गया होगा।

लेकिन कुछ ही पल बाद मैंने देखा कि वही आदमी अब हमारे पीछे दौड़ रहा था।

यह देखकर हम सबकी रूह काँप गई…

कोहरा इतना ज्यादा था कि उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

मैंने अपने दोस्तों को यह बात बताई, लेकिन उन्होंने मेरी बात को मज़ाक समझकर टाल दिया।

फिर हम आगे बढ़ते गए।

तभी अचानक हमें सड़क के किनारे एक चाय की टपरी खुली दिखाई दी।

मैं हैरान था, क्योंकि इतनी सुबह और इतनी ठंड में मैंने कभी किसी चाय की दुकान को खुला नहीं देखा था।

और अजीब बात यह थी कि वह टपरी हमें तब ही दिखाई दी जब हम उसके बिल्कुल पास पहुँच गए।

हम सब वहाँ रुके और चाय पी।

चाय पीने के बाद मेरे एक दोस्त ने कहा कि थोड़ा आगे उसके चाचा के घर के पास जामुन का पेड़ है।

हम सबने कहा,

"चलो, जामुन खाते हैं।"

लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, हमने नोटिस किया कि वहाँ हमारे अलावा कोई नहीं था।

पूरा इलाका सुनसान था।

न कोई घर, न कोई पेड़… चारों तरफ सिर्फ खेत ही खेत थे।

अब हम सबको डर लगने लगा।

कुछ दोस्तों ने कहा,

"हमें वापस चलना चाहिए।"

लेकिन हमारा एक दोस्त आगे जाने की ज़िद कर रहा था।

आखिरकार हमने उसे समझाया और वापस लौटने का फैसला किया।

हमें नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला था…

लेकिन जो हुआ…

उसने हम सबका दिल दहला दिया।अंधेरे में कौन था…?

हम सब वापस लौट रहे थे।

समय लगभग सुबह के चार बजे हो चुके थे, लेकिन अजीब बात यह थी कि अंधेरा अभी भी कम नहीं हुआ था।

चारों तरफ घना कोहरा था और ठंडी हवा चल रही थी। उस समय ऐसा लग रहा था जैसे हम गर्मी में नहीं बल्कि सर्दियों की रात में चल रहे हों।

हम सब तेज़-तेज़ कदमों से वापस जा रहे थे, क्योंकि उस सुनसान जगह पर अब हमें बहुत डर लगने लगा था।

अचानक मेरे दोस्त सूरज ने धीरे से कहा,

"तुम लोगों ने सुना…? पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही है।"

हम सब तुरंत रुक गए।

चारों तरफ गहरा सन्नाटा था।

न कोई आदमी… न कोई गाड़ी… सिर्फ हवा की आवाज़।

मैंने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।

और जैसे ही मैंने पीछे देखा…

मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

कोहरे के बीच वही आदमी खड़ा था, जिसे हमने पहले सड़क पर देखा था।

लेकिन इस बार वह बहुत दूर नहीं था…

वह हमसे सिर्फ कुछ ही दूरी पर खड़ा था।

उसका चेहरा अभी भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

सिर्फ उसका काला सा साया कोहरे में दिख रहा था।

मैंने घबराकर अपने दोस्तों से कहा,

"वो… वही आदमी है… वही जो पहले गायब हो गया था…"

लेकिन इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता,

वह आदमी अचानक हमारी तरफ दौड़ने लगा।

हम सब डर के मारे तेज़ दौड़ने लगे।

दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि ऐसा लग रहा था जैसे अभी बाहर आ जाएगा।

तभी अचानक पीछे से आवाज़ आई —

"रुको…!"

हमने पीछे मुड़कर देखा तो लड्डू जमीन पर गिर पड़ा था।

वह उठने की कोशिश कर रहा था, लेकिन डर के मारे उसका शरीर कांप रहा था।

और सबसे डरावनी बात यह थी कि…

वह आदमी अब लड्डू के बिल्कुल पीछे खड़ा था।

हम सब कुछ पल के लिए जम गए।

कोहरे के बीच वह आदमी धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठा रहा था…

और तभी…

उसकी आँखें चमकने लगीं।

हम सबकी चीख निकल गई।

लेकिन असली डर तो अभी शुरू होने वाला था…कोहरे में छुपा राज

हम सब डर के मारे कुछ पल के लिए वहीं खड़े रह गए।

कोहरा इतना घना था कि हमें ठीक से कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था।

लड्डू जमीन पर गिरा हुआ था और उसके पीछे वही अजीब आदमी खड़ा था।

हम सबकी साँसें तेज़ हो रही थीं।

दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि ऐसा लग रहा था जैसे सीने से बाहर निकल आएगा।

मैंने हिम्मत करके चिल्लाकर कहा,

"लड्डू… जल्दी उठ और हमारी तरफ भाग!"

लड्डू ने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा।

जैसे ही उसने उस आदमी को देखा, उसका चेहरा पीला पड़ गया।

वह जल्दी से उठकर हमारी तरफ भागने लगा।

लेकिन तभी अचानक अजीब सी हवा चलने लगी।

कोहरा और भी घना हो गया।

हम सबको ऐसा लग रहा था जैसे कोई हमें घूर रहा हो।

तभी अचानक पीछे से हँसी की आवाज़ आई…

वह हँसी बिल्कुल इंसानों जैसी नहीं थी।

वह बहुत धीमी और डरावनी थी।

हम सबने एक साथ पीछे मुड़कर देखा।

लेकिन वहाँ कोई नहीं था…

वह आदमी अचानक गायब हो चुका था।

अब डर और भी बढ़ गया था।

मेरे दोस्त सूरज ने कांपती आवाज़ में कहा,

"मुझे लगता है… हमें यहाँ से तुरंत निकल जाना चाहिए…"

हम सब बिना कुछ बोले तेज़ दौड़ने लगे।

दौड़ते-दौड़ते हम आखिरकार मुख्य सड़क तक पहुँच गए।

जैसे ही हम सड़क पर पहुँचे,

कोहरा अचानक कम होने लगा और आसमान थोड़ा साफ दिखने लगा।

हम सबने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी…

आलोक ने धीरे से कहा,

"एक मिनट… अगर वो आदमी इंसान था…

तो फिर वो इतनी जल्दी गायब कैसे हो गया…?"

उसकी बात सुनकर हम सब फिर से खामोश हो गए।

क्योंकि सच में…

जो हमने उस सुबह देखा था, वह आज तक हमें समझ नहीं आया…वो जगह फिर से दिखाई दी…

हम सब मुख्य सड़क पर पहुँचकर थोड़ा शांत हो गए थे।

कोहरा भी अब धीरे-धीरे कम होने लगा था और आसमान हल्का सा नीला दिखने लगा था।

हम सबने सोचा कि शायद जो कुछ हमने देखा था, वह डर और थकान की वजह से हमें ऐसा लग रहा था।

लेकिन मेरे दिल में अभी भी एक अजीब सा डर था।

मैंने अपने दोस्तों से कहा,

"क्या तुम्हें सच में लगता है कि वो आदमी सिर्फ हमारा भ्रम था…?"

सूरज ने धीरे से कहा,

"मुझे नहीं पता… लेकिन जो हमने देखा था, वो बिल्कुल सच जैसा लग रहा था।"

हम सब धीरे-धीरे अपने घरों की तरफ जाने लगे।

लेकिन तभी अचानक मैंने पीछे मुड़कर देखा…

और जो मैंने देखा, उसे देखकर मेरी सांस रुक गई।

दूर, उसी रास्ते पर जहाँ से हम अभी आए थे,

वही चाय की टपरी फिर से दिखाई दे रही थी।

लेकिन इस बार कुछ अलग था…

वहाँ कोई भी नहीं था।

न कोई आदमी… न कोई आवाज़…

सिर्फ टपरी के अंदर एक लाल रंग की हल्की रोशनी जल रही थी।

मैंने अपने दोस्तों को आवाज़ दी,

"उधर देखो… वही चाय की टपरी…"

सबने पीछे मुड़कर देखा।

लेकिन जैसे ही हम सबने ध्यान से देखा…

वो टपरी धीरे-धीरे कोहरे में गायब होने लगी।

अब हम सबको समझ आ गया था कि जो कुछ उस सुबह हुआ था, वह कोई साधारण बात नहीं थी।

और तभी मेरे दोस्त प्रियांशु ने धीरे से कहा —

"अगर वो आदमी… इंसान नहीं था…

तो फिर वो क्या था…?"

उस सवाल का जवाब…

आज तक हमें नहीं मिला।

अगर चाहो तो मैं तुम्हारी कहानी के लिए:पुरानी कहानी का रहस्य

उस दिन के बाद हम सब कई दिनों तक सुबह रनिंग पर नहीं गए।

हम सबके मन में उस सुबह की घटना का डर अभी भी बैठा हुआ था।

जब भी हम आपस में मिलते, उसी बात की चर्चा करते —

वह आदमी कौन था?

और वह चाय की टपरी अचानक गायब कैसे हो गई?

कुछ दिन बाद एक शाम हम सब फिर से राम मंदिर में बैठे थे।

मंदिर में पूजा खत्म हो चुकी थी और आसपास ज्यादा लोग भी नहीं थे।

तभी हमारे पास से एक बुजुर्ग आदमी गुजर रहे थे।

उन्होंने हमारी बातें सुन लीं।

वह थोड़ी देर हमारे पास खड़े रहे और फिर बोले,

"तुम लोग किस जगह की बात कर रहे हो?"

हमने उन्हें पूरी बात बता दी —

कोहरा, सड़क पर खड़ा आदमी, और अचानक दिखने वाली चाय की टपरी।

हमारी बात सुनकर उस बुजुर्ग का चेहरा गंभीर हो गया।

उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा,

"क्या तुम लोग उस पुराने सरकारी स्कूल वाले रास्ते की बात कर रहे हो?"

हम सबने एक साथ कहा,

"हाँ!"

बुजुर्ग कुछ पल चुप रहे…

फिर उन्होंने कहा,

"बहुत साल पहले… उसी रास्ते पर एक अजीब घटना हुई थी।"

हम सब ध्यान से उनकी बात सुनने लगे।

उन्होंने बताया कि कई साल पहले वहाँ एक आदमी चाय की टपरी चलाता था।

लेकिन एक रात अचानक वह आदमी रहस्यमय तरीके से गायब हो गया।

किसी को आज तक नहीं पता चला कि उसके साथ क्या हुआ था।

कुछ लोगों का कहना है कि वह जगह ठीक नहीं है।

कभी-कभी सुबह के कोहरे में

वहाँ अजीब चीज़ें दिखाई देती हैं…

यह सुनकर हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

क्योंकि जो कुछ उस दिन हमने देखा था…

वह बिल्कुल उसी कहानी जैसा था।

और तभी मेरे दिमाग में एक सवाल आया —

अगर वह आदमी कई साल पहले गायब हो गया था…

तो फिर उस सुबह चाय की टपरी पर हमें चाय किसने दी थी…? 👻सच जानने की कोशिश

उस बुजुर्ग की बात सुनने के बाद हम सब कुछ देर तक चुप बैठे रहे।

हम सबके दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था —

अगर वह आदमी सालों पहले गायब हो गया था… तो हमें चाय किसने दी थी?

उस रात हम सब अपने-अपने घर चले गए,

लेकिन मेरे दिमाग से वह बात बिल्कुल भी नहीं निकल रही थी।

मैं बार-बार उसी सुबह के बारे में सोच रहा था।

कोहरा… सुनसान रास्ता… अचानक दिखाई देने वाली चाय की टपरी…

और वह आदमी…

अगले दिन शाम को हम सब फिर राम मंदिर में मिले।

इस बार हमने तय किया कि

हम उस जगह के बारे में सच्चाई पता करेंगे।

मेरे दोस्त सूरज ने कहा,

"अगर सच में वहाँ कोई रहस्य है… तो हमें पता लगाना चाहिए।"

कुछ दोस्त डर रहे थे,

लेकिन आखिर में हम सब तैयार हो गए।

हमने तय किया कि

अगली सुबह हम फिर उसी रास्ते पर जाएंगे।

उस रात मुझे नींद भी ठीक से नहीं आई।

बार-बार वही सवाल मेरे दिमाग में घूम रहा था।

सुबह होते ही हम सब फिर रनिंग के बहाने उस रास्ते पर पहुँचे।

इस बार कोहरा पहले जितना नहीं था।

रास्ता भी थोड़ा साफ दिखाई दे रहा था।

हम धीरे-धीरे उसी जगह की तरफ बढ़ रहे थे

जहाँ हमने उस दिन चाय की टपरी देखी थी।

लेकिन जैसे ही हम वहाँ पहुँचे…

हम सब हैरान रह गए।

क्योंकि वहाँ…

कोई चाय की टपरी थी ही नहीं।

वहाँ सिर्फ पुरानी टूटी हुई लकड़ियाँ और जली हुई मिट्टी पड़ी थी,

जैसे बहुत साल पहले वहाँ कुछ बना था… और फिर खत्म हो गया।

हम सब एक-दूसरे को देखने लगे।

और तभी…

मेरे दोस्त आलोक ने जमीन की तरफ इशारा करते हुए कहा —

"रुको… ये देखो…"

हम सबने नीचे देखा।

मिट्टी पर ताज़े पैरों के निशान बने हुए थे…

और वो निशान

सीधे उसी जगह से आ रहे थे जहाँ हम खड़े थे।

लेकिन अजीब बात यह थी कि

वो निशान आगे नहीं जा रहे थे…

बल्कि अचानक वहीं खत्म हो रहे थे। 👻पैरों के निशान का रहस्य

हम सब मिट्टी में बने उन ताज़े पैरों के निशानों को ध्यान से देख रहे थे।

वो निशान बिल्कुल साफ दिखाई दे रहे थे,

जैसे अभी-अभी कोई वहाँ से गुजरा हो।

लेकिन अजीब बात यह थी कि

निशान अचानक वहीं खत्म हो रहे थे।

सूरज ने धीरे से कहा,

"ऐसा कैसे हो सकता है… कोई यहाँ तक आए और फिर गायब हो जाए?"

हम सबके शरीर में डर की सिहरन दौड़ गई।

तभी अचानक हवा तेज़ चलने लगी।

कोहरा फिर से थोड़ा घना होने लगा।

मुझे अचानक वही सुबह याद आ गई…

जब हमने पहली बार उस आदमी को देखा था।

तभी मेरे दोस्त प्रियांशु ने कहा,

"रुको… मुझे कुछ आवाज़ सुनाई दे रही है।"

हम सब चुप हो गए।

कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

फिर दूर से कपों के टकराने की हल्की आवाज़ आई…

ठीक वैसी ही आवाज़

जैसी चाय की दुकान पर कप रखते समय आती है।

हम सबने एक साथ उस दिशा में देखा।

और फिर…

कोहरे के बीच हमें हल्की लाल रोशनी दिखाई दी।

वह रोशनी धीरे-धीरे साफ होने लगी।

और कुछ ही पल बाद

हम सबकी आँखें डर से फैल गईं।

क्योंकि वहाँ…

वही चाय की टपरी फिर से खड़ी थी।

बिल्कुल उसी जगह

जहाँ अभी कुछ देर पहले कुछ भी नहीं था।

और इस बार…

टपरी के अंदर

कोई खड़ा था।

वह आदमी धीरे-धीरे हमारी तरफ देख रहा था।

उसका चेहरा अभी भी साफ नहीं दिख रहा था।

लेकिन फिर उसने धीरे से हाथ उठाया…

और हमें इशारा करते हुए बोला —

"चाय पियोगे…?"

हम सबके शरीर में डर की लहर दौड़ गई।

क्योंकि हमें अब याद आया…

उस दिन…

हमने इसी आदमी के हाथ से चाय पी थी… 😨टपरी वाले का सच

हम सब उस चाय की टपरी को देखकर पूरी तरह डर गए थे।

अभी कुछ देर पहले वहाँ कुछ भी नहीं था,

लेकिन अब वही टपरी फिर से हमारे सामने खड़ी थी।

और उस टपरी के अंदर वही आदमी खड़ा था।

वह हमें देख रहा था।

उसका चेहरा अभी भी कोहरे की वजह से साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

फिर उसने धीरे से कहा —

"डरो मत… आ जाओ… चाय तैयार है…"

हम सब एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि आगे जाए।

तभी मेरे दोस्त सूरज ने धीरे से कहा,

"मुझे लगता है हमें यहाँ से चले जाना चाहिए…"

लेकिन तभी…

वह आदमी टपरी से बाहर आया।

अब वह हमारे थोड़ा पास आ चुका था।

जैसे ही वह थोड़ा और पास आया,

हमें उसका चेहरा थोड़ा साफ दिखाई देने लगा।

उसका चेहरा बहुत अजीब लग रहा था।

उसकी आँखें गहरी और थकी हुई लग रही थीं,

और उसका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे वह बहुत सालों से सोया नहीं हो।

उसने धीरे से कहा —

"तुम लोग उस दिन भी आए थे…

और आज फिर आ गए…"

यह सुनकर हम सब हैरान रह गए।

क्योंकि इसका मतलब था कि

उसे उस दिन की सारी बात याद थी।

मैंने डरते हुए पूछा,

"आप… कौन हैं?"

कुछ पल तक वह आदमी चुप रहा।

फिर उसने धीरे से कहा —

"बहुत साल पहले…

यहाँ मेरी ही चाय की दुकान थी…"

हम सब ध्यान से उसकी बात सुनने लगे।

उसने आगे कहा —

"एक रात… कुछ अजीब हुआ…

और उसके बाद से मैं…

इस जगह से कभी जा ही नहीं पाया…"

यह सुनकर हम सबके दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

क्योंकि इसका मतलब था…

वह आदमी शायद अभी भी इसी जगह से जुड़ा हुआ था… 👻

और तभी अचानक…

कोहरा फिर से घना होने लगा।

और धीरे-धीरे…

वह आदमी हमारी आँखों के सामने गायब होने लगा।

हम सब डर के मारे वहीं खड़े रह गए।

क्योंकि अब हमें समझ आ रहा था कि

उस जगह पर कुछ ऐसा था…

जो आज तक खत्म नहीं हुआ था।उस रात की सच्चाई

जैसे ही वह आदमी कोहरे में गायब हुआ,

हम सब कुछ पल के लिए जड़ हो गए।

किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ बोलने की।

मेरे दोस्त प्रियांशु ने धीरे से कहा,

"तुम लोगों ने देखा…? वो आदमी सच में गायब हो गया…"

हम सब बहुत डर चुके थे।

हमने तय किया कि अब हमें इस जगह से तुरंत निकल जाना चाहिए।

हम सब जल्दी-जल्दी वापस सड़क की तरफ जाने लगे।

लेकिन मेरे मन में अभी भी एक सवाल घूम रहा था —

उस आदमी के साथ आखिर हुआ क्या था?

उस दिन के बाद हम कुछ दिनों तक उस रास्ते पर नहीं गए।

लेकिन एक दिन मैंने तय किया कि

मुझे इस रहस्य का सच पता करना ही होगा।

मैं अकेले ही उस पुराने सरकारी स्कूल की तरफ गया।

स्कूल बहुत पुराना और टूटा हुआ था।

चारों तरफ सन्नाटा था।

मैं धीरे-धीरे अंदर गया।

स्कूल के एक कमरे की दीवार पर मुझे

पुराना अख़बार का एक फटा हुआ टुकड़ा चिपका हुआ मिला।

मैंने उसे ध्यान से पढ़ा।

उसमें लिखा था —

कई साल पहले इस रास्ते के पास

एक चाय की टपरी वाले आदमी की रहस्यमय मौत हो गई थी।

लोगों का कहना था कि

उस रात घना कोहरा था…

और उसके बाद से कई लोगों ने

कोहरे में उस आदमी को देखने की बात कही थी।

यह पढ़कर मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

क्योंकि अब मुझे समझ आ गया था कि

जिस आदमी से हम मिले थे…

वह शायद इस दुनिया का नहीं था।

मैं जल्दी से स्कूल से बाहर निकल आया।

लेकिन जैसे ही मैं बाहर आया…

मुझे फिर से वही कपों की टकराने की आवाज़ सुनाई दी।

मैंने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा…

और दूर कोहरे में

फिर वही चाय की टपरी दिखाई दे रही थी…

और टपरी के सामने खड़ा वह आदमी

धीरे से मेरी तरफ देख रहा था…

जैसे वह कह रहा हो —

"मैं अभी भी यहीं हूँ…" 👻आखिरी बार…

उस दिन के बाद मैंने फैसला कर लिया था कि

मैं उस रास्ते पर कभी वापस नहीं जाऊँगा।

लेकिन अजीब बात यह थी कि

उस घटना के बाद से मुझे हर रात एक ही सपना आने लगा।

सपने में मैं उसी सुनसान सड़क पर खड़ा होता था।

चारों तरफ घना कोहरा होता था।

और दूर…

वही चाय की टपरी दिखाई देती थी।

टपरी के अंदर वही आदमी खड़ा होता था।

वह मुझे देखता…

और धीरे से हाथ उठाकर इशारा करता —

"इधर आओ…"

मैं डर के मारे उसके पास नहीं जाता था।

लेकिन हर रात सपना थोड़ा-थोड़ा बदलने लगा।

एक रात मैंने देखा कि

टपरी के पास सिर्फ वह आदमी नहीं था…

बल्कि वहाँ कुछ और परछाइयाँ भी खड़ी थीं।

मैं डर के मारे नींद से जाग गया।

अगले दिन मैंने यह बात अपने दोस्तों को बताई।

मेरे दोस्त सूरज ने कहा,

"शायद यह सब उस दिन की घटना की वजह से हो रहा है।"

लेकिन मेरे दोस्त आलोक ने धीरे से कहा —

"अगर यह सपना नहीं हुआ तो…?"

उसकी बात सुनकर हम सब चुप हो गए।

क्योंकि हमारे मन में भी कहीं न कहीं यह डर था कि

शायद वह जगह हमें फिर से बुला रही थी।

और फिर एक दिन…

जब मैं शाम को घर लौट रहा था…

मुझे अचानक वही कपों की टकराने की आवाज़ सुनाई दी।

मैंने धीरे से पीछे मुड़कर देखा…

और जो मैंने देखा…

उसे देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

क्योंकि इस बार वह चाय की टपरी उस सुनसान रास्ते पर नहीं…

बल्कि मेरे घर के पास वाली सड़क पर खड़ी थी। 👻

और टपरी के अंदर खड़ा वह आदमी

धीरे से मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था…

जैसे वह कह रहा हो —

"अब तुम मुझसे बच नहीं सकते…"रहस्य का अंत… या शुरुआत?

जब मैंने अपने घर के पास वही चाय की टपरी देखी,

तो मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि

यह सच है या फिर मेरा वह डरावना सपना।

टपरी के अंदर वही आदमी खड़ा था।

वह मुझे देख रहा था…

और उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी।

मेरे पैर जैसे जम गए थे।

कुछ सेकंड बाद उसने धीरे से कहा —

"तुम सच जानना चाहते थे…

इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ।"

मेरे शरीर में डर की सिहरन दौड़ गई।

मैंने डरते हुए पूछा,

"आप… आखिर चाहते क्या हैं?"

वह आदमी कुछ पल चुप रहा…

फिर उसने कहा —

"मैं यहाँ फँसा हुआ हूँ…

कई सालों से…"

उसने बताया कि कई साल पहले

एक रात कुछ लोग उसकी चाय की टपरी पर आए थे।

उन लोगों ने उससे झगड़ा किया…

और उसी रात उसके साथ बहुत बुरा हुआ।

उसके बाद से उसकी आत्मा

उसी जगह पर भटकती रह गई।

उसने धीरे से कहा —

"जो भी उस रास्ते से गुजरता है…

वह मुझे देख सकता है।"

मैंने डरते हुए पूछा,

"तो आप हमसे क्या चाहते हैं?"

उस आदमी ने मेरी तरफ देखा और कहा —

"बस… मेरी कहानी लोगों तक पहुँचा दो…"

"ताकि लोग जान सकें कि

उस रात मेरे साथ क्या हुआ था…"

इतना कहकर वह आदमी धीरे-धीरे

कोहरे में गायब होने लगा।

और कुछ ही पल में

वह पूरी तरह गायब हो गया।

उस दिन के बाद

मैंने उस आदमी को फिर कभी नहीं देखा।

लेकिन आज भी…

जब सुबह के समय घना कोहरा होता है…

तो मुझे कभी-कभी दूर से

कपों की टकराने की हल्की आवाज़ सुनाई देती है…

और तब मुझे याद आता है —

उस रहस्यमय चाय वाले की कहानी… 👻उस रात की सच्चाई

जैसे ही वह आदमी कोहरे में गायब हुआ,

हम सब कुछ पल के लिए जड़ हो गए।

कोई भी कुछ बोल नहीं पा रहा था।

हमारे सामने जो अभी हुआ था, वह किसी डरावने सपने जैसा लग रहा था।

सूरज ने कांपती आवाज़ में कहा,

"मैंने… मैंने उसे सच में देखा था… वो यहीं खड़ा था…"

मैंने धीरे से कहा,

"हाँ… और उसने हमसे बात भी की थी…"

हम सब कुछ देर तक चुप रहे।

फिर अचानक हमें महसूस हुआ कि हवा फिर से तेज़ चलने लगी है।

कोहरा धीरे-धीरे और घना होने लगा।

तभी अचानक फिर से वही आवाज़ आई —

कपों के टकराने की आवाज़…

हम सबने एक साथ पीछे मुड़कर देखा।

लेकिन इस बार वहाँ कोई टपरी नहीं थी।

न कोई आदमी…

न कोई रोशनी…

सिर्फ खाली मैदान।

हम सबका डर अब और बढ़ गया था।

तभी मेरे दोस्त आलोक ने धीरे से कहा,

"मुझे लगता है… वो आदमी यहाँ फंसा हुआ है…"

मैंने पूछा,

"मतलब?"

आलोक बोला,

"शायद… उसकी आत्मा अभी भी इस जगह से जुड़ी हुई है।"

उसकी बात सुनकर हम सबके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

तभी अचानक हमारे पीछे से एक धीमी आवाज़ आई —

"फिर कभी यहाँ मत आना…"

हम सब तुरंत पीछे मुड़े।

लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

अब हम सब समझ चुके थे कि

यह जगह सच में ठीक नहीं है।

हम बिना एक सेकंड भी रुके वहाँ से भागने लगे।

भागते-भागते हम मुख्य सड़क तक पहुँचे।

जैसे ही हम सड़क पर पहुँचे,

कोहरा अचानक गायब होने लगा।

सूरज की हल्की रोशनी भी दिखाई देने लगी।

हम सबने राहत की सांस ली।

लेकिन उस दिन के बाद

हममें से कोई भी उस रास्ते पर दोबारा कभी नहीं गया।

आज भी जब मैं उस घटना को याद करता हूँ,

तो एक सवाल मेरे मन में जरूर आता है —

अगर वह आदमी सच में कई साल पहले गायब हो चुका था…

तो उस सुबह

हमने चाय किसके हाथ से पी थी…? ☕👻

और कभी-कभी रात में

जब बहुत ज्यादा कोहरा होता है…

तो लोगों का कहना है कि

उस पुराने रास्ते पर आज भी

एक चाय की टपरी की लाल रोशनी दिखाई देती है…

और कोई धीमी आवाज़ पूछती है —

"चाय पियोगे…?"उस घटना के बाद हमने तय कर लिया था कि अब कभी उस रास्ते पर नहीं जाएंगे।

लेकिन इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी होती है — जिज्ञासा।

करीब दो हफ्ते तक हम सब उस रास्ते के पास भी नहीं गए।

लेकिन एक शाम राम मंदिर में बैठे-बैठे वही बात फिर शुरू हो गई।

सूरज ने धीरे से कहा,

"तुम लोगों को नहीं लगता… कि हमें सच पता करना चाहिए?"

नेहा तुरंत बोली,

"तुम पागल हो क्या? हमने जो देखा वो काफी नहीं था?"

लेकिन मेरे मन में भी वही सवाल था।

मैंने कहा,

"अगर सच में वहाँ कोई रहस्य है… तो हमें जानना चाहिए।"

कुछ देर बहस होने के बाद आखिरकार हमने फैसला किया —

आज रात ही हम वहाँ जाएंगे।

यह फैसला शायद हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी।

आधी रात का रास्ता

उस रात हम सब करीब 12 बजे घर से चुपचाप निकल पड़े।

आसमान पूरी तरह काला था।

चाँद भी बादलों के पीछे छुपा हुआ था।

जैसे-जैसे हम उस रास्ते की तरफ बढ़ रहे थे,

हवा ठंडी होती जा रही थी।

और अजीब बात यह थी कि

जैसे ही हम उसी पुराने रास्ते के पास पहुँचे…

फिर से कोहरा शुरू हो गया।

बिल्कुल उसी सुबह की तरह।

मेरे दोस्त प्रियांशु ने डरते हुए कहा,

"ये वही जगह है…"

हम सब धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।

तभी अचानक दूर हमें लाल रोशनी दिखाई दी।

हम सब एक साथ रुक गए।

क्योंकि हमें पता था…

वह क्या हो सकता है।

सूरज ने धीरे से कहा,

"वो… फिर से वही टपरी है…"

इस बार कुछ अलग था

जैसे-जैसे हम पास पहुँचे

हमारा डर बढ़ता जा रहा था।

लेकिन इस बार कुछ अलग था।

टपरी के सामने एक नहीं… बल्कि तीन साये खड़े थे।

हम सब एक-दूसरे को देखने लगे।

नेहा ने डरते हुए कहा,

"वो तीन लोग कौन हैं…?"

तभी अचानक उन सायों में से एक ने अपना सिर हमारी तरफ घुमाया।

और उसी पल…

हम सबकी सांस रुक गई।

क्योंकि वह चेहरा…

लड्डू का था।

लेकिन लड्डू तो हमारे साथ ही खड़ा था।

हम सबने तुरंत उसकी तरफ देखा।

लड्डू का चेहरा बिल्कुल सफेद पड़ चुका था।

वह कांपते हुए बोला,

"वो… वो मैं नहीं हूँ…"

तभी अचानक टपरी के अंदर से वही आवाज आई —

"आ गए तुम लोग…"

हम सबकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

क्योंकि वही आवाज

उस चाय वाले की थी।

लेकिन इस बार उसकी आवाज पहले से ज्यादा भारी और डरावनी लग रही थी।

फिर धीरे-धीरे

वह आदमी टपरी से बाहर आया।

और इस बार…

हमने उसका चेहरा साफ देखा।

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

और उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी।

उसने धीरे से कहा —

"इस बार… तुम लोग वापस नहीं जा पाओगे…"

और तभी अचानक…

कोहरा इतना घना हो गया कि

हमें एक-दूसरे तक दिखाई देना बंद हो गया।

और फिर…

किसी के चीखने की आवाज आई —

"बचाओ…!"

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