अध्याय 1: पुरानी हवेली का रहस्य
उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव में एक पुरानी हवेली थी। लोग कहते थे कि वहाँ रात को अजीब आवाज़ें आती हैं। गाँव के बच्चे हवेली के पास जाने से डरते थे।
एक दिन अर्जुन, जो बहुत बहादुर लड़का था, अपने दोस्तों से बोला,
"मैं आज रात हवेली में जाऊँगा और सच पता लगाऊँगा।"
सबने उसे मना किया, लेकिन अर्जुन नहीं माना। रात होते ही वह टॉर्च लेकर हवेली की ओर निकल पड़ा।
हवेली के दरवाज़े पर पहुँचते ही ठंडी हवा चली, और दरवाज़ा अपने आप चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ खुल गया। अर्जुन का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
अध्याय 2: अँधेरे गलियारे
अर्जुन धीरे-धीरे हवेली के अंदर गया। चारों तरफ धूल जमी थी, और दीवारों पर पुराने चित्र लटके थे।
अचानक उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे चल रहा हो।
वह पलटा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
फिर ऊपर की मंज़िल से किसी के रोने की आवाज़ आई।
"कौन है वहाँ?" अर्जुन ने काँपती आवाज़ में पूछा।
कोई जवाब नहीं आया।
लेकिन रोने की आवाज़ और तेज़ हो गई।
अर्जुन हिम्मत करके सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
अध्याय 3: सफेद साया
ऊपर पहुँचते ही अर्जुन ने एक कमरे का दरवाज़ा आधा खुला देखा।
अंदर से हल्की नीली रोशनी आ रही थी।
जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसने देखा — कमरे के बीचों-बीच एक सफेद साया खड़ा था।
अर्जुन डर के मारे पीछे हट गया।
साया धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा।
"मुझे… मदद चाहिए…"
एक धीमी, डरावनी आवाज़ गूँजी।
अर्जुन ने हिम्मत करके पूछा,
"तुम कौन हो?"
साया बोला,
"मैं इस हवेली की बेटी, राधा हूँ…"
अध्याय 4: अधूरी कहानी
राधा ने अर्जुन को अपनी कहानी सुनाई।
कई साल पहले, हवेली में आग लगी थी।
उस आग में राधा की मौत हो गई, लेकिन उसकी आत्मा यहीं फँस गई।
उसने कहा,
"मेरे कमरे में एक संदूक है। उसमें मेरी माँ की आखिरी निशानी है।
उसे नदी के किनारे वाले मंदिर में पहुँचा दो… तभी मुझे मुक्ति मिलेगी।"
अर्जुन डर रहा था, लेकिन उसे राधा की आँखों में दर्द दिखा।
उसने मदद करने का फैसला किया।
अध्याय 5: डरावनी रात
अर्जुन ने संदूक उठाया और हवेली से बाहर निकलने लगा।
लेकिन तभी हवेली के सारे दरवाज़े बंद हो गए।
चारों तरफ से डरावनी हँसी गूँजने लगी।
राधा चिल्लाई,
"जल्दी भागो! यह हवेली की बुरी आत्मा है!"
एक काला साया अर्जुन के पीछे भागने लगा।
अर्जुन पूरी ताकत से भागा, सीढ़ियाँ उतरकर बाहर निकला, और मंदिर की ओर दौड़ पड़ा।
पीछे से ठंडी हवा और डरावनी चीखें उसका पीछा कर रही थीं।
अध्याय 6: आत्मा की मुक्ति
अर्जुन मंदिर पहुँचा और संदूक पुजारी को दे दिया।
जैसे ही संदूक खोला गया, उसमें से एक पुरानी चाँदी की पायल निकली।
पुजारी ने मंत्र पढ़े।
अचानक आसमान में तेज़ रोशनी फैली।
राधा की आत्मा अर्जुन के सामने आई।
अब उसके चेहरे पर डर नहीं, शांति थी।
"धन्यवाद, अर्जुन… तुमने मुझे आज़ाद कर दिया…"
इतना कहकर वह रोशनी में विलीन हो गई।
उस दिन के बाद हवेली से कभी कोई डरावनी आवाज़ नहीं आई।
गाँव वाले अर्जुन को हीरो मानने लगे।
लेकिन…
आज भी कुछ लोग कहते हैं,
पूर्णिमा की रात हवेली की खिड़की पर एक हल्की सी परछाई मुस्कुराती दिखती है…।
