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Chapter 2 - Unnamed

पाठ=2

तब राजा भोज चौंक गए उन्होंने कहा कि मेरे जैसा कैसे हो सकता है। जरूर कोई में भेरूपिया होगा ।

इतना कह कर राजा भोज शांत हो गए। और उन्होंने ब्राह्मण को फिर से 100सिक्के दिए लेकिन इस बार राजा भोज ने निर्णय किया। कि वह स्वयं ही देखेंगे कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है ।फिर रात में राजा भोज वेश बदलकर उस ब्राह्मण की कुटिया के सामने पहुंच गए। और तभी उन्होंने देखा कि उन्हीं की तरह दिखने वाला व्यक्ति कुटिया में प्रवेश करता है ।और ब्राह्मण से उन सिक्कों को मांगता है ।यहां देखकर राजा क्रोधित हो गए ।और तुरंत उसके पास गए उनसे कहा अरे भेरूपिये तू कौन है ।और इस

बुजुर्ग ब्राह्मण को क्यों परेशान कर रहा है ।तब उस राजा जैसे दिखने वाले व्यक्ति अपने असली रूप में आकर कहां राजन में भाग्य हू। और भाग्य लिखा कोई नहीं टाल सकता इस ब्राह्मण ने अपने जीवन में ऐसे कर्म किए हैं ।जिसके कारण इसके भाग्य में इन सिक्कों का सुख नहीं लिखा गया ह। सबको अपने कर्मों का फल भुगना पड़ता है। यह सुनकर राजा सोच में पड़ गए फिर करूणा भरे स्वर में राजा बोले

तो महोदय में आपसे विनती करता हूं कि इस ब्राह्मण को बख्श दीजिए ।इनके भाग्य का फल में भुगतने को तैयार हूं ।इतना सुनने के बाद भाग्य ने मुस्कुराते हुए कहा ठीक है। राजन जैसी तुम्हारी मर्जी और इतना कह कर भाग्य वहां से गायब हो गये इसके कुछ दिनों बाद राजा भोज एक वन से गुजर रहे थे तभी उनका घोड़ा बेकाबू होकर भागने लगा वहां

घोड़ा भागते- भागते राजा को इतनी दूर ले गया कि उसकी सेवा पीछे छूट गई और फिर वहां घोड़ा एक खाई की और भाग चला और खाई के पास पहुंच कर जोर से रुका जिससे राजा घोड़े से उछलकर ऊंची खाई से नीचे गिर गए ।राजा काफी ज्यादा घायल हो गए उनकी हालत गंभीर थी। तभी वहां एक आदमी आया जिनका नाम गंगू तेली था तो आखिर गंगू तेली ने राजा के साथ क्या किया और क्या हुआ। जब गंगू तेली ने घायल व्यक्ति को देखा

तब वहां नहीं जानता कि यहां कौन है राजा भोज बेहोशी की हालत में थे। गंगू तेली ने अपनी बैलगाड़ी में सुलाया और अपने घर ले ।गया गंगू तेली ने राजा भोज की सेवा की और उनकी मलहम पट्टी भी की इसके कुछ दिन बाद राजा भोज कुछ ठीक हो गए ,जब उन्हें होश आया तो वह समझ नहीं पाएगी वह कहां है ।उन्होंने अपने सामने जीवन दाता को देखा, पर राजा नहीं जानते थे। कि वह किस राज्य में

है इसलिए उन्हें लगा कि यहां दुश्मनों का राज्य हो सकता है। इसलिए गंगू तेली से कुछ नहीं कहा गंगू तेली राजा को एक आम और लाचार आदमी समझ कर अपने यहां काम पर रखने का सोच और उसने राजा को कोल्हू पेलने का काम दिया राजा ने यहां काम खुशी-खुशी स्वीकार किया और कुछ और हर दिन रात कोल्हू को बेल की तरह पेलते और तेल निकालते एक दिन राजा कोल्हू पलते -पलते कुछ

गाने लगे। जिन्हें सुन आसपास के लोग मंत्र मुक्त हो गए ।उन्हें राजा का संगीत काफी पसंद आया राजा काफी अच्छा गाना गाते थे। जिसे गंगू तेली का तेल भी ज्यादा बिकने लगा राजा भोज अपने जीवन दाता का कर्ज चुकाना चाहते थे। इसलिए पूरी तरह ठीक होने पर चुप रहे ,और अपनी असलियत नहीं बताई, उस समय राजा सिद्धराज भी संगीत के बहुत बड़े प्रेमी थे। और उनसे भी बड़ी संगीत की प्रेमी थी ।

उनकी पुत्री उस राज्य की राजकुमारी एक दिन उस राज्य में संगीत का एक विशाल आयोजन रखा गया ।जिसमें कई बड़े-बड़े संगीतकार आए। और सबसे अच्छे संगीतकार को इनाम भी दिया जाना था। यह बात जब गंगू तेली को पता चली तो उसने अपने दास यानी राजा भोज को आमंत्रित किया। और अच्छे कपड़े दिए और उनको भी संगीत में भाग लेने को कहा दोनों महल पहुंचे ।और राजा भोज की बारी आई ,तो उन्होंने ऐसा संगीत सुनाया की पूरी सभा

चकित रह गई ।इतना मधुर की वहां बैठे बड़े-बड़े गायक तक नतमस्तक हो गए ।उनके संगीत सुनकर राजकुमारी अत्यधिक प्रसन्न हुई ।और अपने पिता से विवाह करने की मांग की, यह सुनकर राजा सिद्धराज चौंक गए। और मना करते हुए कहा कि चाहे वहां संगीत में कितना भी कुशल हो पर है। तो एक दास ही तुम्हारा वर सबसे सर्वश्रेष्ठ होगा। तब राम राजकुमारी ने कहा पिताश्री यहां मुझे कोई

साधारण व्यक्ति नहीं लगते, आप चाहे तो इनकी परीक्षा लेकर देख लीजिए। तब राजासिद्धराज सोच में पड़ गए। तब उनकी सभा में विद्वानों की कमी नहीं थी। उस सभा में चार विद्वान मौजूद थे।तप देव, धर्मदेव ,कर्म देव और पुण्य देव राजा इन सभी से एक-एक कर प्रश्न करते है। ताकि वह जान सके कि इस आर्यावर्त में कौन सा राजा सर्वश्रेष्ठ है जो उनकी पुत्री से विवाह कर सके राजा सिद्धराज ने सबसे

पहले धर्मदेव से पूछा धर्म देव बताओ कि इस आर्यावर्त में सबसे धार्मिक राजा कौन है ।तब धर्मदेव ने कहा कि महाराज मेरी जानकारी के अनुसार थार नगरी के राजकुमार राजा भोज ही सबसे बड़े धार्मिक राजा है ।इसके बाद सिद्ध राज ने कहा कर्मदेव से कि इस संसार में सबसे अच्छे कर्म

किसके हैं ।तब कर्म देव ने भी राजा भोज का नाम लिया और इसी तरह राजा सिद्धराज तब देव और पुण्य देव से भी प्रश्न किया। और उनके एक ही उत्तर था ।राजा भोज यहां सब सुनकर राजा ने भरी सभा में कहा कि मेरी पुत्री का वर राजा भोज हो सकते है। यह सब सुनकर राजा भोज कुछ पल शांत हो गए। और विनम्रता पूर्वक कहा महाराज में ही राजा

भोज हू। यह सुनकर सब चौंक गए और राजा क्रोधित हो गए। और बोले यह कैसी गुस्ताखी है ।एक आम कलाकार होकर अपने आप को इतना बड़ा राजा बता रहे हो ।किसी के चरित्र पर इस प्रकार की टिप्पणी, तुम्हें शोभा नहीं देती और अगर तुम राजा भोज हो तो यहां कैसे आए ।तब भोज ने

कहा महाराज सबसे बड़ी चीज होती है। भाग्य और भाग्य का लिखा कोई नहीं बदल सकता भाग्य गरीब को भी अमीर बन सकता है ।और राजा को पल भर में नौकर और मैं भी इस भाग्य का शिकार हूं। यह मेरे भाग्य का ही फल है। आज मैं यहां हूं गंगू तेली के नौकर के रूप में खड़ा हू। यहां सुन राजा सोच में पड़ गए और थोड़ी जांच पड़ताल के बाद पता चला कि यही राजा भोज है सुनकर गंगू तेली भी चौंक गया

इसके बाद राजा सिद्धराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजा भोज से कर दिया ।और फिर जब पूरे राज्य को यहां बात पता चली की गंगू तेली ने अनजाने में एक राजा को अपना दास बना दिया तब सब गंगू तेली का मजाक उड़ाते, और करने लगे कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली यह कहानी ज्यादा तक लोक कथाओं परंपराओं में मिलती है। जो राजा भोज और

गंगू तेली प्रसंग को एक कहानी के रूप में दर्शाती है ।यहां पर इतिहास सच्चाई से काफी अलग है राजा भोज का असली इतिहास इससे भी कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है और अब यहीं से शुरू होती है उसे राजा की असली यात्रा जिसने युद्ध भूमि को दुश्मनों के लहू से लाल कर दिया उस राजपूत राजा की कहानी जिसके ज्ञान के सामने बड़े-बड़े विद्वान

नतमस्तक हो जाते थे। और उस राजा की कहानी जिसके अंत में सबको हैरान कर दिया। और सबसे बड़ी बात ''कहां राजा भोज'' और ''कहां गंगू तेली" इस कहावत की असली सच्चाई नहीं जानते अभी हमने राजा वह लोक कथाओं और सदियों से चली आ रही कहानियों में मिलता है ।तो जानते ही राजा भोज का असली इतिहास,

बात है। 1010 राजा भोज का मालवा पर शासन था । राजा भोज बुद्धिमान थे। पर उनके सैन्य शक्ति व बल का भी काफी दूर-दूर पहचान हो चुकी थी ।

और उनका लक्ष्य था। अपने पिता राजा सिंधु राज की अपमानजनक हार का बदला लेना माना जाता है। कि राजा भोज के पिता राजा सिंधु चालुक्य वंश से अपना अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा था। अब भोज इस हार का बदला लेना चाहते थे ।उन्होंने जल्दबाजी नहीं की और अपनी बुद्धि और

सैन्य शक्ति से चक्रव्यूह रचना चालू कर दिया। और चालुक्य वंश पर धावा बोल दिया। उस समय चालुक्य वंश के राजा जय सिंह राज कर रहे थे। राजा भोज और जय सिंह के बीच लंबे समय तक

युद्ध चला हालांकि भोज उन्हें पूरी तरह हारा नहीं पाए पर अपने बुद्धि बल से उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। और मालवा साम्राज्य का विस्तार किया और इसी कालखंड में राजा भोज का सामना कल्चरी वंश के राजा से भी हुआ। जिनमें सत्ता त्रिपुरा में थी। यानी आज के समय मध्य प्रदेश का

क्षेत्र भोज ने अपने नीतियों से त्रिपुरा के कई क्षेत्रों को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया माना जाता है ।कि 1010 से 1030 ई के बीच का समय राजा भोज के लिए साम्राज्य विस्तार का स्वर्ण काल था। उनके प्रभाव का क्षेत्र मालवा से आगे बढ़कर राजस्थान

कुछ हिस्सों कोकण क्षेत्र और पश्चिमी भारत तक महसूस किया जाने लगाइए विस्तार केवल सीधे युद्ध से नहीं बल्कि कूटनीति ,धर्म और प्रतिष्ठा तीनों में भूमिका निभाई गई छोटे शासक बिना युद्ध किए ही भोज की अधीनता स्वीकार करने लगे क्योंकि उनकी सैन्य शक्तिऔर उनकी रणनीति का प्रभाव दूर-दूर

तक फैल चुका था उनके अभियानों ने स्पष्ट कर दिया कि मालवा अब किसी के अधीन रहने वाला राज्य नहीं है। राजा भोज ने अपने चारों ओर एक ऐसा प्रभाव मंडल बना दिया था। जिन में मित्र और शत्रु दोनों उन्हें गंभीरता से लेने लगे थे। यही वहां दौर

था ।अब राजा भोज का नाम केवल मालवा में ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर और मध्य भारत और मालवा में गुजरने लगा लेकिन फिर 11वीं शताब्दी में भारत के संस्कृति और धर्म पर सीधा वार किया। गया जिसने देश को जगजोर कर रख दिया गया साल 1025 ई जब गर्जनी का शासक मोहम्मद गर्जन ने गुजरात के

सोमनाथ मंदिर को तोड़ा तो देश में उसका कर चलने लगा। उसने न केवल मंदिर को तोड़ा बल्कि उसे लूट भी और वहां आए भक्तों को भी मार डाला, इस बात से राजा भोज काफी क्रोधित हुए, और माना जाता है। कि राजा भोज के साथ कई राजाओं ने वहां गर्जनी की सेना पर दबाव डालना शुरू किया। जिसके डर से उनकी सेवा सीधे मालवा मार्ग के

बजाय थार के रेगिस्तानों के कटीले रास्तों से होकर गुजरने लगी, इसी प्रतिरोध मे सबसे शक्तिशाली गूंज सुनाई देती हैं, साल 1034 ईस्वी में जब उत्तर भारत की धरती पर बेहराइज में एक निर्णायक संघर्ष हुआ ।लोक कथाओं के अनुसार मध्यकालीन समय और ग्रंथों के अनुसार राजनवी सेनापति सालार मसूर जिसे महमूद गजनवी का भांजा बताया जाता है एक विशाल सेवा के साथ आगे बढ़ रहा था। इस समय उत्तर भारत राजा सुहेलदेव एक प्रमुख हिंदू शासक

के रूप में उभरे जिन्होंने राजा भोज के साथ मिलकर बेहराइज का युद्ध लड़ा बेहराइज का युद्ध इतना भयंकर बताया जाता है। कि इसमें सालार मसूद की सेना पूरी तरह नष्ट हो गई और स्वयं सालार मसूद मारा गया। यह युद्ध भारतीय जनमानस में धर्म की

रक्षा और विदेशियों के आक्रमण के विरुद्ध विजय के प्रतीक के रूप में स्थापित हो गया। वैसे इतिहास में कई ऐसे राजा हुए जिन्होंने युद्ध भूमि पर अपना परचम लहराया पर उनमें से बहुत कम ही ऐसे हुए जो युद्ध के साथ-साथ एक ज्ञानी और विद्वान शासक रहे, उन्ही में से एक थे ।राजा भोज जिन्होंने

न जाने कितनी किताबें लिखी और 84 ग्रंथ भी रचे और उनकी अद्भुत इंजीनियरिंग आज भी लोगों को हैरान कर देती है। 11वीं शताब्दी का भारत मालवा क्षेत्र राजा भोज के शासन काल में केवल सैन्य शक्ति का ही केंद्र नहीं था। बल्कि ज्ञान ,साहित्य, विज्ञान आदि का प्रमुख केंद्र बन गया माना जाता है कि

राजा भोज से कई दर्जन ग्रंथ जुड़े हुए परंपरागत रूप से इन्हें 84 ग्रंथो का रचयिता या रक्षक माना जाता है।

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