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Chapter 3 - Unnamed

{पाठ=3}

प्रमाण वंश के राजा भोज के असली इतिहास

बात है 1010 ई राजा भोज का मालवा पर राज था राजा भोज बुद्धिमान थे । पर उनके सैन्य शक्ति का बाल भी काफी दूर-दूर पहचान ना हो चुकी थी और उनका पहला पक्ष था अपने पिताजी राजा सिद्धू राज की अपमानजनक हार का बदला लेना माना जाता है कि राजा भोज के पिता राजा सिद्धू चालुक्य वंश से अपना जनक अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा था अब राजा इस हार का बदला लेना चाहते थे उन्होंने जल्दबाजी नहीं की और अपनी बुद्धि और सैन्य शक्ति से चक्रव्यूह रचना चालू कर दिया और चालुक्य वंश पर धावा बोल दिया उसे समय चालू किया वंश के राजा जय सिंह राज कर रहे थे राजा भोज और जय सिया के बीच लंबे समय के लंबे समय का युद्ध चला हालांकि भोज उन्हें पूरी तरह हार नहीं नहीं पाए पर अपने बुद्धि बल से उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और मालवा साम्राज्य का विस्तार किया और इसी काव्य खंड में राजा भोज का सामना कलंजरी वंश के से भी हुआ जीत जीतने के जिनकी सट्टा त्रिपुरा में थी यानी आज के मध्य प्रदेश का क्षेत्र भोज ने अपने नीतियों से त्रिपुरा के कई क्षेत्रों को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया माना जाता है कि 1010 से 1030 ई के बीच का समय राजा भोज के लिए साम्राज्य विस्तार का स्वर्ण काल था उनके प्रभाव का क्षेत्र मालवा से आगे बढ़कर राजस्थान के कुछ हिस्सों कोकण क्षेत्र में और पश्चिमी भारत तक महसूस किया जाता जाने लगाइए विस्तार केवल सीधे युद्ध से नहीं बल्कि कूटनीति भैया और प्रतिष्ठा तीनों ने इस में कोई छोटा शासक बिना युद्ध किया ही भोज की अधीनता स्वीकार करने लगे क्योंकि उनकी सेवा की शक्ति और उनकी रणनीति का प्रभाव दूर-दूर तक फैल चुका था उनके अभियानों ने स्पष्ट कर दिया कि मालवा अब किसी के अधीन रहने वाला राज्य नहीं था राजा भोज अपने चारों ओर एक ऐसा प्रभाव मंडल बना लिया था जिसमें मित्र और शत्रु दोनों अपने उन्हें गंभीरता से लेने लगे थे यही वहां दौर था जब राजा भोज का नाम केवल मालवा में ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर और मध्य भारत में मालवा में गुजरने लगा लेकिन फिर 11वीं शताब्दी में भारत के संस्कृति और धर्म पर सीधा वार किया गया जींस ने देश को झोंक जोर जंग जोड़ कर रख दिया साल 1025 ई जब गरजानी का शासक मोहम्मद गर्जन ने ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर को तोड़ा तो देश में उसका कर चलने लगा उसने न केवल मंदिर को तोड़ा बल्कि उसे लूट भी और वहां आए भक्तों को भी मार डाला इस बात से राजा भोज को काफी क्रोधित हुए और माना जाता है कि राजा भोज के साथ कई राजाओं ने वहां गरजानी की सेवा पर दबाव डाला शुरू किया जिसके डर से उसकी सेवा सीधे मालवा मालवा मार्ग के बजाय थार के रेगिस्तानों के टटोल रास्तों से होकर गुजरने लगी इसी प्रतिरोध सबसे शक्तिशाली गूंज सुनाई देती साल 1034 ईस्वी में जब उत्तर भारत धरती बहराइच में एक निर्णायक संघर्ष हुआ लोक कथाओं के अनुसार मध्यकालीन समय और ग के अनुसार राजनीति सेनापति सालार मसूर जिसे मोहम्मद राजनवी का भांजा बताया जाता है एक विशाल सेवा के साथ आगे बढ़ रहा था

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