हम सब डर के मारे गेट के पास खड़े थे।
वही आदमी सामने खड़ा था और धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ रहा था।
आलोक ने हिम्मत करके कहा —
"तुम कौन हो?"
वह आदमी मुस्कुराया।
उसकी मुस्कान बहुत अजीब थी।
फिर उसने कहा —
"यह स्कूल मेरा है… और जो भी यहाँ आता है… वह कभी वापस नहीं जाता।"हम किसी तरह ऑफिस रूम में वापस गए।
डायरी के अगले पन्ने में लिखा था—
"मेरा नाम महेश था। मैं इस स्कूल का टीचर था।
एक रात कुछ लोगों ने मुझे यहीं मार दिया।
तब से मेरी आत्मा इस जगह में फँसी हुई है…"
यह पढ़कर हमारे हाथ काँपने लगे।तभी स्कूल में बच्चों के पढ़ने की आवाज़ आने लगी—
"अ… आ… इ… ई…"
जबकि स्कूल पूरी तरह खाली था।
हम सब डरकर खिड़की के पास गए।
लेकिन मैदान बिल्कुल सुनसान था।अचानक दीवारों पर कई परछाइयाँ दिखाई देने लगीं।
लेकिन असली लोग वहाँ नहीं थे।
नेहा डरकर बोली —
"ये सब क्या हो रहा है?"
तभी एक परछाई अचानक हमारी तरफ बढ़ने लगी।अचानक हमारी टॉर्च बंद हो गई।
पूरा स्कूल फिर से अंधेरे में डूब गया।
सिर्फ एक लाल रंग की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी…
जो पुराने स्टोर रूम से आ रही थी।हम डरते-डरते स्टोर रूम के पास पहुँचे।
दरवाज़ा थोड़ा खुला था।
अंदर बहुत पुराने डेस्क और कुर्सियाँ रखी थीं।
तभी अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।
"धड़ाम!"
हम सब चिल्ला उठे।फर्श पर अजीब-अजीब निशान बने हुए थे।
मानो किसी ने जमीन पर कुछ खींचा हो।
सूरज बोला —
"ये रास्ता शायद बाहर जाता होगा।"
हम उन निशानों के पीछे चलने लगे।निशान हमें एक टूटी दीवार तक ले गए।
दीवार के पीछे एक छोटी सुरंग थी।
हम सब धीरे-धीरे उस सुरंग में घुस गए।
अंदर बहुत ठंड थी।अचानक सुरंग के पीछे से वही आदमी की आवाज़ आई—
"तुम लोग भाग नहीं सकते…"
हम सब तेजी से आगे बढ़ने लगे।सुरंग के अंत में एक छोटा कमरा था।
कमरे के बीच में एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी।
और दीवार पर लिखा था—
"सच जानना चाहते हो?"हमें एक और कागज़ मिला।
उसमें लिखा था—
"जिस रात मेरी मौत हुई…
मेरे अपने ही छात्रों ने मुझे धोखा दिया…"
अब हमें समझ आया कि उस आत्मा का गुस्सा क्यों है।तभी अचानक वही आदमी हमारे सामने प्रकट हो गया।
उसकी आँखें लाल चमक रही थीं।
उसने कहा—
"अब तुम सब भी यहाँ रहोगे…"मैंने अपने दोस्तों से कहा—
"डरो मत… हमें बाहर निकलना होगा।"
हम सब एक साथ गेट की तरफ भागे।अचानक हमें एक टूटी खिड़की दिखाई दी।
शायद वही बाहर जाने का रास्ता था।
हम जल्दी-जल्दी वहाँ पहुँचे।जैसे ही हम खिड़की से बाहर निकलने लगे…
वही आदमी फिर सामने आ गया।
इस बार वह बहुत गुस्से में था।तभी अचानक सुबह की पहली रोशनी दिखाई दी।
सूरज निकल रहा था।
और जैसे ही रोशनी उस आदमी पर पड़ी…
वह धीरे-धीरे गायब होने लगा।हम तुरंत स्कूल से बाहर भागे।
अब कोहरा भी खत्म हो चुका था।
चारों तरफ सामान्य माहौल था।
मानो कुछ हुआ ही नहीं।हम सब चुपचाप अपने घर चले गए।
लेकिन उस दिन के बाद…
हममें से कोई भी उस स्कूल के पास नहीं गया।
क्योंकि हमें पता था…
वह जगह आज भी खाली नहीं है।
और कभी-कभी रात में…
वहाँ से आज भी बच्चों की आवाज़ आती है। please comment like for my kahani have motivation me
